वाराणसी। गंगा ना सिर्फ एक नदी बल्कि लोगों की आस्था की प्रतीक भी है और आज ही के दिन भगवान विष्णु के चरणों से गंगा निकलकर शिव की जटाओ में गयी थी।इसलिए पुराणों आदि के अनुसार सतयुग से लेकर आज तक ये दिन गंगा अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

धार्मिक नगरी वाराणसी में भी इस दिन माँ गंगा की आराधना एवं दूध से अभिषेक किया गया और मौजूद लोगो ने गंगा को प्रदुषण मुक्त करने का संकल्प भी लिया।

आज ही के दिन माँ गंगा भगवान् विष्णु के चरण कमल से गंगा निकलकर शिव की जटाओ में समाई थी क्योंकि गंगा जब भगवान विष्णु के चरण कमल से निकली थी तब उनका वेग बहुत था और उसी बेग को भगवान् शंकर ने अपने जटाओ में समां कर उनका वेग शांत किया, लेकिन इन सब के बाद भी अमृत कहा जाने वाला गंगा का ज़ल न ही स्वछ है और न ही निर्मल गंगा हमारी आस्था को प्रकट करती है और गंगासप्तमी यानी गंगा अवतरण दिवस के दिन वाराणसी में लोगों के हुजूम ने एक संकल्प लिया की अब गंगा को मैली नहीं होने देंगे और इसके लिए प्रार्थना की खुद माँ गंगा से !

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक पंडित श्रीकांत मिश्रा ने बताया कि धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज के ही दिन पतित पावनी माँ गंगा का अवतरण हुआ था और वो स्वर्ग से धरती पर आयी थी। यही कारण है कि काशीवासी अपनी आस्था की केंद्र बिंदु माँ गंगा का आज के दिन विधिविधान से पूजन अर्चन करते है और इसी क्रम में दश्वाशमेध घाट पर काशी के पुरोहितों एवं आम ज़नमानस ने माँ गंगा का अभिषेक किया। वैसे शिव और गंगा का ये संगम आने वाले भक्तों को पुन्य और मोक्ष का मार्ग प्रदान करता है, लेकिन जिस तरह से गंगा विकास की अंधी दौड़ में मैली हुयी हैं भक्तों के मन में भी अपने कल्याण से ज्यादा गंगा की अविरलता और स्वछत़ा की कामना है । गंगा के इस पावन पर्व पर वाराणसी के गण्य मान्य लोग भी उपस्थित रहे।